हिमईरा उत्पादों को एक माह में देशभर से मिले एक हजार अर्डर
हिमाचल आजकल
शिमला। महिलाओं को सशक्त और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सु²ढ़ करने की हिमाचल प्रदेश सरकार की पहल के आशाजनक परिणाम सामने आ रहे हैं। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने बीते 3 जनवरी को आधिकारिक तौर पर ई-कमर्स प्लेटफॉर्म किया था और अब तक इसे अति उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली है। केरल, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के ग्राहकों को अब तक 1,050 ऑनलाइन ऑर्डर सफलतापूर्वक वितरित किए जा चुके हैं जोकि प्लेटफॉर्म की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा कि इस डिजिटल मंच के जरिए प्रदेशभर के 30 हजार स्वयं सहायता समूहों की महिनाआें को आजीविका के उन अवसरों तक सीधी पहुंच मिली है जो पहले उनकी पहुंच से बाहर थे। वेबसाइट पर हाथ से बुने हिमाचली वस्त्रों से लेकर शुद् और प्रातिक खाद्य पदार्थों सहित लगभग 30 उत्पादों की विविधतापूर्ण रेंज उपलब्ध है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान सरकार राज्य की संस्कृति और पर्यावरण के अनुरूप नीतियां बना रही है, जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और स्वरोजगार के अवसरों को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वह केंद्रीय मंत्रियों और अन्य लोगों को हिमईरा के उत्पाद उपहार में दे रहे हैं। साईनाथ स्वयं सहायता समूह में शामिल होने के बाद सोलन जिले की नालागढ़ निवासी जसविंद्र कौर के जीवन में अहम बदलाव आया है। वित्तीय सहायता और पशुधन तथा गैर-षि गतिविधियों के लिए 60,000 रुपये के ऋण के साथ उन्होंने गाय के गोबर से उत्पाद बनाने का काम शुरू किया। उनकी मासिक आय जो कभी मात्र 1,000 रुपए हुआ करती थी अब 20 हजार रुपये हो गई है।
कांगड़ा जिले के सुलह की मेघा देवी की सफलता की कहानी भी कुछ एेसी ही है। श्री गणेश स्वयं सहायता समूह में शामिल होने के बाद उन्होंने डोना-पत्तल का उद्यम शुरू किया। उनकी मासिक आय 5 हजार रुपए से बढक़र 20 हजार रुपए हो गई है।
लाहौल-स्पीति जिले के केलांग में रिग्जिन को कांगला बेरी स्वयं सहायता समूह के माध्यम से जीवन में आगे बढऩे का एक नया अवसर मिला। कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प और हथकरघा से जुडक़र उनकी मासिक आय 4 हजार रुपए से बढक़र 25 हजार रुपए हो गई है। अब वह अपने उद्यम का विस्तार और ग्रामीण बाजारों में नए अवसरों की तलाश करने की योजना बना रही हैं। हमीरपुर जिले के झमियात गांव की अनीता देवी शुरू में एक निजी आईटी नौकरी पर निर्भर थीं जहां उन्हें पांच हजार रुपए मिलते थे। स्वयं सहायता समूह के साथ उनकी यात्रा बुनियादी बचत के साथ शुरू हुई। मशरूम की खेती के लिए एनआरएलएम द्वारा प्रदान किए गए प्रशिक्षण के माध्यम से उनकी मासिक आय धीरे धीरे बढक़र 20 हजार रुपए हो गई।


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