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शिमला l राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर ने आज ऊना जिला के अपने प्रवास के तीसरे व अन्तिम दिन जिला ग्रामीण विकास अभिकरण के सभागार में आयोजित बैठक में ऊना जिला में संचालित की जा रही विभिन्न विकासात्मक योजनाओं और फ्लैगशिप परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की। उन्होंने सभी अधिकारियों को सरकार की योजनाओं के बारे में लोगों को जागरूक करने और इन योजनाओं के शत-प्रतिशत पात्र लाभार्थियों को लाभ पहंुचाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि हम सभी को किसी न किसी रूप में समाज को अपना योगदान अवश्य देना चाहिए।
राज्यपाल ने बंगाणा उप-मंडल के अन्दरौली में क्रियान्वित की जा रही नृवंशविज्ञान (एथनो-बोटेनिकल गार्डन) बाग परियोजना में गहन रूचि दिखाते हुए निम्न शिवालिक पर्वत श्रृंखला में उपलब्ध जैव-विविधता के महत्त्व और इसके दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इसके बेहतर दस्तावेजीकरण, वेटलैंड की पहचान इत्यादि के लिए पंचायत स्तर पर समितियों का गठन किया जाए। उन्होंने जिला में स्थित विभिन्न वेटलैंड क्षेत्रों में आने वाले प्रवासी पक्षियों के बारे में भी जानकरी प्राप्त की और वन विभाग के अधिकारियों को बर्ड फोटोग्राफर और बर्ड वाॅचर को सुविधाएं प्रदान करते हुए इस क्षेत्र में पर्यटन विकास को प्रोत्साहित करने के निर्देश दिए। उन्होंने स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देने के दृष्टिगत यहां वार्षिक आधार पर बर्ड वाॅचर के लिए समारोह आयोजित करने का भी सुझाव दिया।
प्राकृतिक खेती पर चर्चा करते हुए राज्यपाल ने कहा कि यह पद्धति वाणिज्यिक तौर पर भी व्यवहारिक है और कृषि विभाग को किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि रसायनों, उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों और विभिन्न गंभीर बीमारियों से बचा जा सके। उन्होंने कहा कि इस दिशा में पूर्व में बेहतर प्रयास हुए हैं और इसमें और गति लाने की आवश्यकता है।
बैठक में राज्यपाल ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, जल जीवन मिशन, आयुष्मान भारत और हिमकेयर योजना, कोविड टीकाकरण, समग्र शिक्षा अभियान और दौलतपुर चैक से तलवाड़ा रेलमार्ग के प्रस्तावित विस्तार कार्यों की भी समीक्षा की। राज्यपाल विभिन्न विभागों के प्रयासों की सराहना करते हुए अधिकारियों से और अधिक लग्न से कार्य करने का आग्रह किया ताकि जिला को राज्य में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो सके।
राज्यपाल ने निम्न शिवालिक पर्वत श्रृंखला में उपलब्ध जैव-विविधता के दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर बल दिया
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