ऑनलाइन शॉपिंग से कारोबारियों का धंधा होने लगा चौपट
हिमाचल आजकल
शिमला। हिमाचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोक संस्कृति की पहचान रहा
अंतरराष्ट्रीय लवी मेला अब आधुनिक ई कॉमर्स बाजार की चुनौती से जूझ रहा
है। ऑनलाइन बाजार के बढ़ते दायरे ने मेले की रौनक और स्थानीय कारोबार
दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इससे स्थानीय किसान और किन्नौरी
उत्पाद बेचने वाले पारंपरिक व्यापारी प्रभावित हो रहे है।
किन्नौर के व्यापारी मानते है कि वह पिछले 20 से 25 वर्षों से लवी
मेले में अपने पारंपरिक उत्पाद चिलगोजा, कुर्बानी, बादाम और किनौरी
वस्त्र को बेचते आ रहे हैं। लेकिन अब बिक्री में लगातार गिरावट आ रही है।
लिहाजा व्यापारियों का कारोबार चौपट होने की कगार पर पहुंच गया है। लवी
मेले में पहले खरीददार दिल्ली, अंबाला व चंडीगढ़ तक से यहां आते थे। इन
खरीददारों की किनौरी उत्पाद पहली पसंद होती थी। लेकिन बीते कुछ सालों
में लवी मेला की रौनक फीकी पड़ने लगी है। इसके पीछे ऑनलाइन शॉपिंग बड़ा
कारण माना जा रहा है। लवी मेले में जो ग्राहक पहले रामपुर तक आते थे,
वे अब ऑनलाइन से ही अपनी पसंद की वस्तु को मंगवा रहे है। इससे मेले के
कारोबार पर बहुत असर पड़ा है।
अहम बात यह है कि ऑनलाइन खरीदारी ने न केवल ग्राहक घटाए हैं बल्कि
स्थानीय किसानों के उत्पादों को भी नुकसान पहुंचाया है।
मेले में आए किसानों का मानना है कि अगर प्रदेश सरकार गांवों में
ई-कॉमर्स ट्रेनिंग और वर्कशॉप आयोजित करे तो ग्रामीण महिलाएं भी ऑनलाइन
बाजार से जुडक़र अपने उत्पाद बेच सकती हैं।

लवी मेला दुकान लगाने वालों की सालभर की कमाई का जरिया हुआ करता था। किन्नौर व रामपुर क्षेत्र के लोगों खुद कई तरह का उत्पाद तैयार करते है। लवी मेले में दुकान लगा कर सामान बेचते है। मेले में लोई, किनारी और ऊनी कपड़े की ज्यादा डिमांड रहती है। लेकिन ऑनलाइन बाजार ने यहां के लोगों के कारोबार से भारी नुकसान पहुंचने लगा है। स्थानीय लोगों को चिंता इस बात की है कि आने वाले समय में लवी मेले में लोगों का आना कम हो जाएगा। इससे उनके उत्पाद की डिमांड भी कम हो जाएगी। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि अगर सरकार समय रहते स्थानीय उत्पादों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और ब्रांडिंग सहायता नहीं देगी तो लवी जैसे पारंपरिक मेले धीरे धीरे खत्म हो जाएंगे।


| All Rights Reserved | Website By :