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शिमला। भारत की विकसित रोबोटिक तकनीक और भारतीय डॉक्टरों की विशेषज्ञता ने एक बार फिर दुनिया को चौंका दिया है।प्रसिद्ध कार्डियक सर्जन डॉ. सुधीर श्रीवास्तव ने गुयाना में बैठकर भारत के इंदौर में एक मरीज के हृदय की सफल रोबोटिक टेली-सर्जरी कर चिकित्सा इतिहास में नया विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया है। करीब 20,000 किलोमीटर की दूरी से की गई यह सर्जरी दुनिया की अब तक की सबसे लंबी दूरी की रोबोट-सहायित कार्डियक टेली-सर्जरी मानी जा रही है। यह ऐतिहासिक प्रक्रिया गुयाना के जॉर्जटाउन पब्लिक हॉस्पिटल कॉर्पोरेशन और भारत के आईआरसीऐडी इंडिया, इंदौर के बीच सफलतापूर्वक संपन्न हुई।इस उपलब्धि की सबसे खास बात यह है कि सर्जरी पूरी तरह भारत में विकसित एस एस आई मंत्रा सर्जिकल रोबोटिक सिस्टम की मदद से की गई जिसने भारत को वैश्विक रोबोटिक सर्जरी क्षेत्र में एक नई पहचान दिलाई है।डॉ. सुधीर श्रीवास्तव ने गुयाना में स्थित एस एस आई मन्त्रासन टेली सर्जन कंसोल पर बैठकर सर्जरी को नियंत्रित किया, जबकि मरीज इंदौर स्थित आईआरसीऐडी इंडिया में मौजूद था। रोबोटिक आर्म्स ने डॉक्टर के हाथों की गतिविधियों को रियल टाइम में दोहराया और हृदय की जटिल प्रक्रिया लेफ्ट इंटरनल मेमरी आर्टरी टेक डाउन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। करीब 290-300 मिलीसेकंड नेटवर्क लेटेंसी के बावजूद पूरी सर्जरी बेहद सटीकता और स्थिरता के साथ संपन्न हुई। भारत में इस प्रक्रिया के दौरान मणिपाल हॉस्पिटल, जयपुर के चीफ कार्डियक सर्जन डॉ. ललित मलिक टेबल-साइड सर्जन के रूप में मौजूद रहे।
एसएस इनोवेशन्स इंटरनेशनल इंक. के संस्थापक और सीईओ डॉ. सुधीर श्रीवास्तव ने कहा कि “20,000 किलोमीटर की रिकॉर्ड दूरी पर सफल कार्डियक टेली-सर्जरी यह साबित करती है कि भविष्य में दुनिया के किसी भी कोने में बैठे मरीज तक सर्वश्रेष्ठ सर्जिकल विशेषज्ञता पहुंचाई जा सकती है। हमारा लक्ष्य विश्वस्तरीय सर्जरी को हर व्यक्ति तक पहुंचाना है। उन्होंने गुयाना सरकार, विशेष रूप से राष्ट्रपति डॉ. मोहम्मद इरफान अली तथा भारत और गुयाना की तकनीकी एवं चिकित्सा टीमों का आभार व्यक्त किया।
एस एस आई मंत्रा की टेली-सर्जरी तकनीक को विशेष रूप से लंबी दूरी और उच्च नेटवर्क लेटेंसी वाले वातावरण में भी सटीकता बनाए रखने के लिए विकसित किया गया है। अब तक इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से दुनिया भर में 173 से अधिक टेली-सर्जरी सफलतापूर्वक की जा चुकी हैं।एस एस आई मंत्रा को अब तक भारत समेत 14 देशों में नियामकीय स्वीकृति मिल चुकी है।


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